Sunday, February 5, 2017

हड़बडाहट में ठहराव

सुबह से शाम की भगा दौड़ में है जीवन. पानी पीना भी गलास में, श्थिर से  बैठ के नहीं होता. 
हाथ में रंग बिरंगी बोतले लेके चल रहे है. मनो बैठ गए तो गाड़ी छूट जाएगी, ऐसी छूटेगी की दुबारा दिखेंगी भी नहीं / 

सुबह उठते ही मोबाइल का जागरूग इन्टरनेट छिखने लगता है, उठा  लो भाई नहीं तो फेसबुक मौसी, व्हाट्सएप्प चहाची और इंटेलेक्चुअल हुए तो ट्विटर भाबी बुरा मान जायेगे. 

और अगर सफ़ेद कॉलर वाले नौकर हुए तो अंग्रेज मालिक का मुनीम मेनेजर चीड़ जायेगा/

नास्ते करना भी सिर्फ कहना नहीं है, वो एक विंडो ऑफ़ रिलैक्सेशन है, टीवी चलो, न्यूज़ तो लगेगा मोहले के सरे लडके सूट बूट वाले बन गए है/ गाने के नाम में जो माथा फोड़ चीख़े सुनाई देती है/ मानो सुबह से मैदान भी न गए हो हमारे अति शुर में डुबे गायक / गायक है या भोपू के जीते जागते स्वरुप/

आदमी करे तो क्या करे?

एक उपाय है, ऐसा लगता है हमको /

एक बार अगर हम अपने हिंदुस्तानी, कर्नाटिक संगीत की कोर देखे तो शायद/ माथा न फटे हमारा/
एक तो शांति से फिर से मुलाकात हो सकेगी/ अपने पूर्वजो की धरोवर से पहचान हो पायेगी/
संगीत के नाम पे छल हो  है उसकी जानकारी होगी / 

क्या  पता वीणा फिर याद आ जाएगी/ बाँसुरी, सितार 'कुल' जेनेरशन को ठहराव की समाज  देजाय/

आपके  सुनने के लिए कुछ youtube लिंक्स है / उमीद है कुछ फायदा हो जाये/


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