Thursday, September 10, 2015

धुल

कई दिनों से किताबों पे जमी धुल
मानो निहार रही थी।
आज वक़्त मिला तो एक एक करके
धुल हटाने लगे।
हर किताब को हाथ में लेते ही कुछ
जिये हुए लम्हेँ आँखों के सामने थे।
आस पास मानो एक पुरानी फ़िल्म चल रही हो
फ्लैशबैक, में कहानी कह रहा हो कोई
कुछ, पुरानी डायरी के पन्नों में कोई
और जी रहा था,
मदहोस पागलपन में झुम रहा था
एक मुस्कराहट थी आज उसे उन पन्नों
में जीके, एक वक़्त था जो जी चुका था कोई।

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