Thursday, July 3, 2014

एक कार्ड

गुजरते हुएं , archies की भीड़   देखी 
तो याद आया  आज तो वैसा  दिन है,
थोड़ी देर रुक गया, सबके चेहरे पे  खुसी थी,
मैंने भी हिम्मत की और एक कार्ड ढूंढ़ने  लगा ,
एक तो पसंद भी आया , फिर पलट के  M.R.P को देखा,
 जेब टटोली तो अपनी औकात में नहीं था ये प्रेम कार्ड ,
घर लौटा,  सोचा गुलज़ार की किताब से कुछ 
उधार ले लु, और एक चिट्टी लिख डालु,
पोस्टल स्टाम्प आज भी १० रुपये का आ जायेगा 
वो ओल्ड वर्ल्ड वाला चार्म जैसा कुछ भी हो जायेगा,
एक कलम, और कुछ पन्नों  के साथ, 
गुलजार की किताब ले के लिखने को बैठा ,
कई पन्नें  भर गए, लेकिन अभी भी बहुत कुछ बाकी था,
लेकिन बोरिंग हो जाने का भी थोड़ा डर सा था,
अपने ड्रायर के एक कोने से वो सम्भाल के रखा लिफ़ाफ़ा निकला , 
बड़े  तरीके से उस चिट्टी को लिफाफे में डाल  के 
मैं  पोस्ट ऑफिस की ओर चला,
अभी  कुछ दुर चला था की फ़ोन की घंटी बजी,
मोबाइल ऑपरेटर ने समस से  दिन की बधाई दी ,
रुका मैं , लगा  यार कहाँ इस लम्बी चिट्ठी को इस 
इंस्टेंट समस और watsapp के ज़माने कोई पढ़ेगा ,
सारी गुलज़ारियत वही धरी की धरी रह गयी,
वो  बात याद आ गयी , 
समय बदल गया है तुम भी बदलो 
अब इंस्टेंट consumer बन जाओ,




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