Tuesday, May 6, 2014

इस इलेक्शन मजदूर के घर का एक इशू !!!

आज सवेरे सवेरे चिल्लाने और रोने कि आवज़ आई. मै अंदर  के कमरें  में बैठा  था। मुझे लगा  रोज की तराह पानी  लिये झगड़ा  हो रहा होगा। मैं  अपनी दिनचर्या मे लगा रहा।  लेकिन आवाज़ थमी नहीं  बलकि और भी तेज हो गई। जोर जोर से रोने की आवाज आने लगी. मुझसे रहा ना गया और मै भागता हुआ दरवाजे कि तरफ़ गया।   बहार आके देखा तो मालूम चल सामने के घर से ये आवाज़ें आ रही  थी।  मोहले की काकी जोर जोर से विलककर  अपने घर मे रो रही थी।  पुछने से मालुम चला कि कई दिनो से उनके पति जुट मिल मे काम पर नही  जा  रहे है। सारा दिन दारू पीके  इधर उधर गुलाटी मारते फिर रहे है।   ऐसा इनके घर मे साल भर   होता हैं.  ये मजदूर लोग है जिनको दिन का  150 -200 रुपैये मिलते है।  परिवार में दो बेटी और एक बेटा है और घर में कमाने वाला एक ही  मर्द। अगर एक ही कमाने वाला काम पे ना जाये तो घर चलना मुस्किल हो  जायेगा।  चुलें पे रोटी और चावल कहाँ से आयेगा।  इन सभ समस्याओं के बारे मे सोच कर ककी  झगड़ पडी अपने पति से थोड़ी हातपायी भी हुई. बेटियों ने भी  अपने पिता को खूब धुतकारा लेकिन नसे  मे डुबे व्यक्ती को जऱा  भी सर्मिंदगी नही हुईं।  देखते ही देखते मोहलें के लोग जुड गये और खुंब डॉन्ट लगाईं  कका को।  बड़े होने के कारण मेरे पिताजी ने भी कई बार काका को  समझाने की  कोशिश की और आज भी वो कर रहें थे  लेकिन दारु की लत बडी मुश्कील से पिछा छोड़ती है.

मेरे ऑफिस जाने क वक़्त हो रहा था , टट्रैन   के चुट जानें क डर  भी  रहता है हर सुबहें।  मैं ऑफिस के लिए तैयार होने के लिये घर के अंदर आ गया, इतने मे पिताजी भी वापास आ गये।  मेरे मन में एक सवाल चल रहा था।  मैं सोच रहा था की अगर दारू के कारणं  बर्वाद हुए दिन को अगर  paid छुट्टी के रुप मे ले लिया जाये तो उस दिन के पैसे मिल सकते है और शायद काकी चुप  हो  जाये।  मैंने ये बात पिताजी से कहीं  , वो हॅस पड़े।  मैंने पुछा हँसें क्यों ? हम IT वालोँ को तो रेलक्स करने के लिये paid holiday मीलता है जिसमें ज्यादातर लोग दारू  हि पिना  पसन्द करते है।  ऐसा इन मजदूरों के साथ भी होता होंगा।  पिताजी बोलें यहाँ मजदूरों को काम के दिन के पुरे पैसे नहि मिळते और तुम पेड हॉलिडे कि बात करते हो.
मैंने फिर अपने communist पिताजी से पुछा की 34 साल आप लोगो की सरकार रहि, जो मजदूरों की पार्टी होने का दावा करती है इतना भी  ना  कर सकी।
तब तक मेरे ऑफिस का  टाइम हो चुक था , मैने लैपटॉप बैग मे डाला और निकल पड़ा ट्रैन के लिए. जाते जाते रविश कुमार कि तराहा सवाल आने लगे , क्या कोइ पार्टी इन मजदूरों कि सहि नुमाइंदगी करेगि? क्या दीदी , विकाश पुरुस , पप्पु  या comrade महोदय कभी  इनकि बात करेँगे? ना मेरे सवालों के लिये NDTV का माइक्रोफोन था और न कोइ दर्शक. इन सवालों के साथ मैं स्टेशन पहुँचा  और 8 : 40 की सुबह की नैहाटी लोकल मे कलकत्ते कि ओर चल दिया।

1 comment:

Manish Jain said...

very simple yet very complex questions....