Thursday, January 23, 2014

टुटा छत मेरा


मेरे टूटे  छत से , आसमां बड़ा साफ़ दिखता है,

कभी कभी तो बारिश कि बुँदे भी मेरे बिस्तर का पता ढुंढ़लेती  है,

तो कभी सुरज की  पहली  किरण  भी आँखों को छेड़,

सुबह सुबह नींद को भगा जाती है,

कभी इस टूटे छत से तंग होता हु तो लगता है,

एक सीमेंट कि बोरी मँगवा लू और इसकी मरमत करवा लु ,

पर फिर लगता है कि, कही घुटन न हो जाये इस कमरे में ,

एक ही तो दुनिया है मेरी जहाँ बेफिक्र रहता हु,

असमान, बारिश और हवा जहाँ बिना पूछे आ जाती है,

मौसम की,
 बिना ए।  सी, के मजे दे जाती है, 

अभी तो न बिजली के बिल कि चिंता है 

ना पैसे  के लिए दौड़ कि जरुरत ,

बन गयी गई अगर टूटी छत  मेरी तो ,

ये बादशाहत कहाँ  रहेगी , फिर बंद कमरे में,

 कमरे के तापमान कि गुलामी होगी और उसके बिल के लिए गुलाम मैं  !!!

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