Wednesday, July 11, 2012

सपनो की बुँदे


एक सपने के घरोंदे की छत पे 
बरसात की बूंदों में झूमे थे हम 
टपकते बूंदों में पलकों को मूंदकर 
झोकों के मजे लिए थे,
खुली बाहों में अपने कैद कर तुझे, 
अपनी अलग दुनिया में ले चला था 
उन बुंदों को थपथपाहट में 
अपनी उंगलियों से पियानो बजाय था.
उन बरसात की बुंदों में आखें मूंदकर 
एक लम्हा पिरोया था,
उस सपने की घरोदे पे 
बुंदों से आसयां बनाया था 


Forgive me for the cruel spelling mistakes.

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