Sunday, January 8, 2012

उम्मीद की गठरी को आज भी 
मेरा दिल संभाले रखा है /
नादान है जो उस उमीद पे अटका पडा है 
हर रोज यही सोचता है 
शायद मेरी सुबह आज आएगी 
उसकी एक पैगाम लाएगी /
नादान दिल मेरा वहीँ अटका पडा है/

 फ़ोन की हर घंटी पे वही सोचता है 
शायद ये घंटी उसी  की होगी 
दुसरे आवाज शायद  उसी  की होगी /

नादान दिल मेरा उमीद लगाये 
बस उसी  का इंतजार करता है 
नादान है ये, नासमज है 
बस उसी से मोहब्बत किये जाता है 
इसी  उमीद में जिए जाता है 
वो सुबह जरुर होगी 
जब वो मेरे साथ मेरे बाहों में होगी /

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