Tuesday, December 13, 2011

बेरुखी


आज बेरुखी ऐसी हुई कि 
लब्जो ने भी साथ ना दिया
ऐसी भी क्या खता हुई
की सिहाई ने भी मेरी
खाली पन्नो को रंगने से नकार दिया
एक शब्दों का ही साथ था इस 
बेखुदी में, आज उसने भी धुत्कार दिया
पन्ने ही तो थे जिनसे मै कहा करता था 
तनहाई में अपनी गुफतगुह किया करता था
पर जाने क्या खता हुई
की उसने भी हमे सुनने से  इंकार कर दिया 
जाने क्या खता हुई हमसे 

2 comments:

Sourav Kumar Verma said...

अंकेश जी लगता है उनकी "बेरुखी" मे भी प्यार झलकता है !!!

Ankesh at Talk said...

@Saurav ji... bas pyar hi hai jiske karan sab chalakta hai :)