Sunday, January 31, 2010

तेरे होने क़ी वजह क्या है ?


तू कौन है ,
 तू है क्यों ?
तेरे होने क़ी वजह क्या है ?  

तू चिक्ख़ता  क्यों है ?
क्यों जकड़ा हुआ है तू ?
तेरे होने क़ी वजह क्या है ?

क्यों पागलो की
तरह बेचैन है तू ?
क्यों कभी खुद पे और
कभी दुसरो पे हँस क्यों रहा है तू ?
तेरे होने क़ी वजह क्या है ?

कभी नउम्मीद और
कभी उम्मीद की पोटली,
क्यों है तू ?
क्यों सोया नहीं तू ,
क्यों बेचैन करवटे बदलता है तू ?

किस खोज में है तू ,
जब माया को जानता है तू ?

क्यों भीड़ से अलग है तू,
पर भीड़ के साथ होने की
चाह रखता है तू ?
क्या रूह है तू मेरी ?
कभी सोचा है , आखिर
तेरे होने क़ी वजह क्या है ?


लेखन: अंकेश साहा,
CopyRight Protected 1985





2 comments:

Bunty said...

OMFG!

nothing could describe me more than it! could relate to it soo much!

Ankesh at Talk said...

@ Bunty

Ya both seems to suffer from the same kind of identity crisis, the question wat we are here for is bothering us like hell